जैसे-जैसे शहर पर्यावरण के अनुकूल यातायात की ओर बढ़ रहे हैं, इलेक्ट्रिक शहर बसें एक अच्छा विकल्प बनती जा रही हैं। लेकिन इन्हें चलाने की लागत, खासकर टायरों की लागत को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं, क्योंकि शहर में बार-बार रुकने और चलने से टायरों पर ज़्यादा दबाव पड़ता है। ऐसे में टायर रिट्रेडिंग एक अच्छा विकल्प हो सकता है। लेकिन क्या यह सच में इलेक्ट्रिक बसों के लिए संभव है? आइए सरल भाषा में समझते हैं।
इलेक्ट्रिक व्यवसायिक गाड़ियों जैसे बसों में डीज़ल गाड़ियों के मुकाबले ज़्यादा टॉर्क होता है। इसका मतलब यह है कि टायर जल्दी घिसते हैं, खासकर शहरों में जहां बार-बार रुकना-चलना होता है। इससे टायरों को बार-बार बदलना पड़ता है, जिससे खर्च भी बढ़ता है।
ऐसे में रिट्रेडिंग एक तरीका हो सकता है लागत कम करने का। लेकिन इलेक्ट्रिक गाड़ियों के टायरों में सिर्फ़ पैसा ही नहीं, बल्कि प्रदर्शन भी ज़रूरी होता है।
रिट्रेडिंग का मतलब है पुराने टायर के ऊपरी हिस्से (ट्रेड) को हटाकर नया ट्रेड लगाना, लेकिन उसका ढांचा (केसिंग) वही रहता है। व्यवसायिक गाड़ियों के बहुत सारे बेड़े इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं ताकि लागत घटे और कचरा कम हो।
कई बार रिट्रेड किए गए टायर डीज़ल इंजन वाली बसों में नए टायर जैसे ही काम करते हैं।
इलेक्ट्रिक बसों के टायरों को बैटरी पैक और रिजनरेटिव ब्रेकिंग सिस्टम का वजन सहना पड़ता है। इसलिए अगर टायर का ढांचा थोड़ा भी कमज़ोर है, तो वह असुरक्षित हो सकता है।
यह खतरा उन शहरों में और बढ़ जाता है जहां मौसम बहुत गर्म या बहुत ठंडा होता है, या सड़कें ठीक नहीं होतीं। हर मौसम या हर वजन में रिट्रेड टायर एक जैसे प्रदर्शन नहीं कर सकते, खासकर तब जब बस को समय पर चार्ज करना ज़रूरी हो।
रिट्रेडिंग से प्रति टायर लगभग 40% तक बचत हो सकती है। बड़ी इलेक्ट्रिक बसों की फ्लीट के लिए यह काफी लाभदायक साबित हो सकता है। इससे पर्यावरण को भी फायदा होता है क्योंकि रबर का कचरा कम होता है।
लेकिन कुछ मामलों में रिट्रेड टायरों से रोलिंग रेसिस्टेंस बढ़ सकता है, जो इलेक्ट्रिक गाड़ियों में ऊर्जा दक्षता और दूरी पर असर डालता है। इसलिए ऑपरेटरों को लागत बचत और सुरक्षा के बीच संतुलन बैठाना पड़ता है।
कुछ इलेक्ट्रिक बस निर्माता टायर रिट्रेडिंग की इजाजत नहीं देते क्योंकि इससे प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है। कुछ निर्माताओं की शर्तें होती हैं जैसे सिर्फ़ पिछली धुरी (रियर एक्सल) पर ही रिट्रेड टायर लगाए जा सकते हैं।
सरकारी विभाग भी नियम बना रहे हैं। भारत के परिवहन विभाग इलेक्ट्रिक व्यवसायिक गाड़ियों के लिए नए सुरक्षा मानकों पर काम कर रहे हैं, जिनमें रिट्रेड टायरों का इस्तेमाल भी शामिल है। जब तक नियम नहीं बनते, निर्णय की ज़िम्मेदारी ऑपरेटर और टायर विशेषज्ञों पर ही रहेगी।
हाँ, लेकिन हर जगह नहीं। रिट्रेड किए गए टायर तयशुदा वजन और तय मार्ग वाली इलेक्ट्रिक बसों में ठीक काम कर सकते हैं, खासकर पिछली धुरी पर। लेकिन शहरों के भारी ट्रैफिक और तेज़ टॉर्क वाले रास्तों के लिए नए टायर ही ज़्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प हैं।
जरूरी है कि टायर की उम्र पर नज़र रखें, समय-समय पर जांच कराएं और ऐसे पार्टनर से रिट्रेडिंग करवाएं जो इलेक्ट्रिक बसों की ज़रूरतों को समझते हों।
इलेक्ट्रिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट की ओर बढ़ते समय लागत प्रबंधन ज़रूरी है, लेकिन सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए। रिट्रेडिंग एक दिलचस्प विकल्प है, लेकिन इसे सोच-समझकर और सावधानी से अपनाना चाहिए। बदलती तकनीक के साथ रिट्रेडिंग उद्योग को भी नयी सोच अपनानी होगी।
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