हाईवे के अंदर: टाटा 407 ट्रक जिसमें सवार थे आलिया भट्ट और रणदीप हुड्डा

अपडेट किया गया : 03-Oct-2025, 04:39:39 pm

हाईवे के अंदर: टाटा 407 ट्रक जिसमें सवार थे आलिया भट्ट और रणदीप हुड्डा

जानिए कैसे टाटा 407 ट्रक ने हाईवे में आलिया भट्ट और रणदीप हुड्डा की यात्रा को भावनाओं और फ़िल्मी अंदाज़ से जोड़ दिया।

समीक्षा

लेखक

JS

By Jyoti

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हाईवे एक ऐसी कहानी है जो एक चलती हुई व्यवसाय वाहन और महाबीर (रणदीप हुड्डा) तथा वीरा (आलिया भट्ट) के बीच बनते रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमती है। जैसे ही वे भारत की सड़कों पर सफ़र करते हैं, ट्रक कहानी का बहुत अहम हिस्सा बन जाता है। निर्देशक इम्तियाज़ अली इस ट्रक को एक ख़ास अंदाज़ में दिखाते हैं। ट्रक का भीतरी रंग, छोटा सा स्थान और कैमरे के कोण – यह सब कहानी कहने में मदद करते हैं। यह ट्रक सिर्फ़ एक वाहन नहीं लगता, बल्कि फ़िल्म का ज़िंदा हिस्सा महसूस होता है।

ट्रक एक कहानी कहने की जगह

ट्रक के अंदर, वीरा का पहला अनुभव डर और कैद का था। धातु की दीवारें, धुंधले हरे-भूरे रंग का अंदरूनी हिस्सा और इंजन की आवाज़ उसकी घबराहट बढ़ा देते थे। जैसे-जैसे महाबीर अलग-अलग जगहों से गुजरता है, ट्रक जुड़ाव का एक साधन बन जाता है। टाटा 407 की हरकत वीरा की भावनाओं की यात्रा को दोहराती है। रेगिस्तानी सड़कों पर अकेलापन उसकी कमजोरी दिखाता है। पहाड़ी रास्तों पर कैमरे के भीतर लिए गए दृश्य विश्वास और समझ की झलक देते हैं। और जब सड़कें खुलती हैं तो चौड़े शॉट्स आज़ादी का एहसास कराते हैं।

फ़िल्मकारों ने इन बारीकियों को जोड़ा

  • रंग और रोशनी: अंदर के हल्के रंग बाहर के चमकदार नज़ारों से टकराते हैं, जिससे वीरा का डर और उसकी आज़ादी साफ़ दिखती है।
  • छायांकन: दूर के शॉट्स ट्रक के अकेलेपन को दिखाते हैं, वहीं पास के शॉट्स दोनों पात्रों के बीच बढ़ते भरोसे को उजागर करते हैं।
  • सामान और बनावट: पुराना डैशबोर्ड, ढीले हैंडल और इधर-उधर रखी चीज़ें असलियत और भावनाओं की गहराई लाती हैं।

इस तरह ट्रक एक खामोश कहानीकार बन जाता है, जिसके साथ ही पात्रों के अंदरूनी बदलाव उनके सफ़र के साथ-साथ सामने आते हैं।

क्यों चुना गया टाटा 407?

हाईवे की शूटिंग के लिए एक हल्का लेकिन मज़बूत ट्रक चाहिए था, जो कठिन रास्तों, पहाड़ी सड़कों और सुनसान रेगिस्तानी इलाकों से निकल सके। टाटा 407 ने भरोसेमंदी, टिकाऊपन और लचीलापन दिया। इसका छोटा लेकिन मज़बूत ढाँचा क्रू को कठिन जगहों पर ले जाने में मदद करता था, बिना शूटिंग में रुकावट डाले।

इसके केबिन में क्रू और कैमरों के लिए पर्याप्त जगह थी, जिससे क़रीबी भावनात्मक दृश्य आसानी से शूट हो सके। इसका छोटा सा स्थान कहानी की मनोवैज्ञानिक कसावट को तो दिखाता ही है, लेकिन साथ ही कैमरे को क़रीबी रिश्तों और अकेलेपन को कैद करने का मौका भी देता है।

कैसे पता चला कि यह टाटा 407 था?

सबसे पक्की पुष्टि फ़िल्म के छायाकार अनिल मेहता से मिलती है। उन्होंने एक इंटरव्यू में साफ़ कहा था कि शूटिंग के लिए टाटा 407 का इस्तेमाल किया गया। उनके अनुसार, इस ट्रक को शूटिंग के हिसाब से तैयार किया गया था, ताकि यह लगातार बाहरी शूटिंग की कठिनाइयों को झेल सके और कैमरा टीम को केबिन के अंदर गहरे दृश्य फ़िल्माने का मौका दे सके।

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